बेर की खेती कैसे करे -How to cultivate plum

बेर की खेती कैसे करे How to cultivate plum 


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                                                   बेर BER
                                     वैज्ञानिक नाम Zizyphus jujuba
                                              कुल -Rhamnaceae 

बेर की खेती 

उपयोगिता  

बेर गरीब लोगों का फल है यह सर्व सुलभ है और फसल के दिनों में बहुत सस्ता मिलता है अच्छे पके हुए पैर बहुत स्वादिष्ट लगते हैं देर में पोषक तत्व विशेषकर विटामिन A. B. C  और लोहा प्रचुर मात्रा में पाया जाता है इस में प्रोटीन कैल्शियम फास्फोरस प्रोटीन और विटामिन सी काफी मात्रा में पाया जाता है आयुर्वेद की दृष्टि से मीठा बेर ठंडा रूप और रक्त शुद्ध करने वाला होता है तथा आंखों की ज्योति भी बढ़ाता है यह भूख भी लगाता है सूखा पेड़ बलवर्धक सुपाच्य और पाचक है इसका सेवन थकावट ,प्यास  और भूख को दूर करता है। 

बेर में कौन-कौन से तत्व पाए जाते हैं 

जल 85.9 प्रतिशत, प्रोटीन 0.8 प्रतिशत, कार्बोहाइड्रेट 12.8 प्रतिशत, 0.1 प्रतिशत कैल्शियम 0.03 प्रतिशत। 

बेर की उत्त्पत्ति

बेर का जन्म स्थान भारत ही है और इसे हमारे देश में अत्यंत प्राचीन काल से उगाया जा रहा है शायद ऐसा ही कोई स्थान हो जहां बेर के पेड़ उपलब्ध ना हो कुछ विद्वान सीरिया को बेल की जन्मभूमि मानते हैं। 

भूमि और जलवायु 

बेर भूमि और जलवायु  दोनों ही दृष्टि से बहुत अच्छा फल है और मौसम की विभिन्न अवस्थाओं में उड़ सकने की अद्भुत क्षमता रखता है यह अधिक गर्मी लो और पाली को भी सहन कर लेता है ऐसी कोई भूल नहीं यहां पर कौन हो गया जा सके।  

बलुई से लेकर मृतका  भूमि तक में बेर पनप सकने की क्षमता रखता है और सुखा को सहन करने में  भी समानता नहीं रखता कटीला होने के कारण या अपनी रक्षा स्वयं कर लेता है और जंगली पशु भी से हानि नहीं पहुंचा पाते हैं ऊसर भूमि  में प्रायः  कोई फल शाक भाजी अथवा अन्य फसल ऊगता है   लेकिन बैर भी उसमेंसफलतापूर्वक उगाया जा सकता है। 

 बेर के उत्पादन क्षेत्र कौन-कौन से हैं

मध्य प्रदेश के जंगलों में बेर के वृक्ष और पौधे अधिकतम पाए जाते हैं बड़ौदा अहमदाबाद नागपुर लखनऊ और बनारस इत्यादि स्थानों में बैर की बहुतायत पाई जाती है बड़ौदा में 125 हेक्टेयर और उत्तर प्रदेश में 250 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्रफल में बेर के वृक्ष बाग लगे हुए हैं। 

 पूर्वी आज प्रदेश में बेल के फल की खेती बहुत बड़े क्षेत्रफल में की जाती है बिहार के शाहाबाद जिले और पूर्वी उत्तर प्रदेश के मुख्य वाराणसी जिले में बहुत उत्तम किस्म का बेर उगाया जाता है मथुराअलीगढ़ जिले में सहपऊ और सासनी (हाथरस) क्षेत्र के बेर बहुत प्रसिद्ध हैं। 

खाद और उर्वरक

बेर के प्रत्येक पौधों में प्रतिवर्ष 100 किलोग्राम नाइट्रोजन 50 ग्राम फास्फोरस तथा 50 ग्राम पोटाश खाद देना चाहिए बेर के पौधे में पर्याप्त खाद दिए जाने पर उनकी उपज और फलों का आकार तथा गुणों में सुधार होता है देर में पूर्वक जुलाई महीने में साफ मौसम में देना चाहिए। 

 तने से लगभग आधा मीटर की दूरी छोड़कर बेर के पौधे पेड़ के चारों और खाद की टक्कर और फिर भूमि को और अथवा कुदाल से कूदकर उसे मिट्टी में मिला देना चाहिए पौधों के अच्छे विकास के लिए 20 से 25 किलोग्राम गोबर की खाद प्रतिवर्ष प्रति पेड़ वर्षा के मौसम में देनी चाहिए। 

 प्रवर्धन 

बेर के पौधों को दो विधियों से तैयार किया जाता है-

 1. बीज बोकर  2.मुकुलन द्वारा   3. चोटी कलम लगाना 

1. बीज   बोकर -बेर के प्रवर्धन का यही ढंग सबसे अधिक प्रचलित हैं बीज गड्ढों में ही बोलना चाहिए क्योंकि बेल का पौधा स्थांतरण सहन नहीं कर सकता 20 फरवरी मार्च में बोए जाने पर 20 से 30 दिन में अंकुरित हो जाता है पेड़ का बीज वर्षा ऋतु में भी बोया जा सकता है। 

2.मुकुलन द्वारा -अच्छी फल  प्राप्त करने के लिए   मुकुलन द्वारा ही बेर  को लगाना चाहिए मुकुलन द्वारा पाबंदी या कॉल मी बैक तैयार किए जाते हैं 1 वर्ष की आयु में के तने पर भूमि से 30 से 40 सेंटीमीटर की ऊंचाई पर वर्षा ऋतु में कल्याण किया जाता है। 

3.चोटी कलम लगाना- देश के विभिन्न भागों में बंजर पड़ी भूमियों या खेतों की मेड़ों पर आसपास जंगली अवस्था में उगते हुए बेर के पेड़ काफी दिखाई पड़ते हैं। 

चोटी कलम लगाकर अच्छी स्थिति में लाया जा सकता है और उनसे उन्नत किस्म की फल प्राप्त किए जा सकते हैं 20 कलम बांधने के लिए जंगली वृक्ष को भूमि की सतह से 1 से 2 मीटर की ऊंचाई पर दिसंबर-जनवरी में काट दिया जाता है फिर कटी हुई चोटी के थोड़ा नीचे से निकलने वाली शाखा में से सबसे स्वस्थ शाखा को छोड़कर शेष काट देते हैं इसे चुनी हुई शाखा की मोटाई जब पेंसिल की मोटाई के बराबर हो जाती है तो उस पर डाले चश्मा कल ही लगा दी जाती है। 

बेर के पौधे कैसे लगाए

मुकुलन विधि द्वारा तैयार पौधों को गड्ढा में लगभग 7 मीटर की दूरी पर लगाया जाता है अधिकांश बेर के पौधों को बाघ के किनारों पर लगाया जाता है और इस प्रकार यह पेड़ कुछ सीमा तक बाद में लगाए गए अन्य पेड़ों की लू आंधी और पहले से भी रक्षा करते हैं बेर के पेड़ तैयार करने के लिए झरबेरी जैसी किस्मों के बीज से उगाए गए पौधों से चश्मा बंदी की जाती है बेर के स्कंद को भूमि से एक सही एक बटे दो(1/2 ) मीटर की ऊंचाई पर काटकर नई शाखाओं की कलम में लगाई जाती हैं। 

बेर की सिंचाई

बेर के पेड़ो में जाड़े के दिनों में प्रतिवर्ष एक अथवा दो सिचाईयाँ केर देने पर पेड़ खूब फलते -फूलते है। 

उपज 

बेर के पेड़ों से प्रतिवर्ष लगभग 100 से 200 किलोग्राम भार प्राप्त होते हैं। 

किट  नियंत्रण 

फल मक्खी -बेर को सबसे अधिक हानि फल मक्खी से होती है इस मक्खियों की लौंडिया फलों को खाती हैं जिसके कारण फल खाने में तेरे मेरे हो जाते हैं फल के अंदर बीज के चारों तरफ खाली स्थान बन जाता है और फल चढ़कर बेकार हो जाता है। 

रोकथाम अक्टूबर नवंबर के महीने में जब छोटे होते हैं उस समय दो बार 0.2 प्रतिशत सुमिसीडीन  के घोल का छिड़काव करना चाहिए। आवश्यकता पड़ने पर तीसरा छिड़काव 0.0 5% मैलाथियान के घोल का फरवरी के महीने में छिड़काव करना चाहिए। 


बेर बिटिल -बेर डिटेल तथा अन्य पत्तियां खाने वाले कीटों के आक्रमण होने पर जून जुलाई के महीने में 0.2% से भिन्न के घोल का छिड़काव करना चाहिए। 

रोकथाम -छोटे पौधों पर बी० एच० सी 10% धूल अथवा फ़ोलीडाल 2 प्रतिशत धूल का भुरकाव करना चाहिए। 

रोग नियंत्रण

पाउडर की तरह फफूंदी(Powdery Mildew )

बेर में अधिक रोग नहीं लगते इनमे  मुख्य रूप  पाउडर की तरह फफूंदी रोग लगता है यह रोग जाड़े में दिखाई देते है। 

रोकथाम -जिससे पत्तियां तथा फल बहुत बुरी तरह प्रभावित होते हैं इस पर एक प्रकार से सफेद पदार्थ की परत चढ़ जाती है प्रभावित फलों की पत्तियों की वृद्धि रुक जाती है इसकी रोकथाम के लिए घुलनशील गंधक जैसे सल्फैक्स  अथवा इलोसाल की 3 किलोग्राम मात्रा को 1000 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें पहले फिर का फूल आने से पहले और 15 दिन के अंतर पर करते रहे। 



लीची की उन्नतशील खेती कैसे करें cultivate litchi's

लीची की उन्नतशील खेती कैसे करें How to cultivate litchi's advanced plant


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लीची की खेती 

उपयोगिता

लीची एक अत्यंत स्वादिष्ट फल है जिसे बच्चे विशेष रूप से पसंद करते हैं या फल हल्के लाल रंग का होता है और छिलका उतार देने पर सफेद गुदा निकलता है जिसे खाने के लिए प्रयोग किया जाता है गुर्दे के अंदर बीज का निकलता है। 

लीची का फल प्राकृत में ठंडा वाटर होता है इसमें आवश्यकताएं 15.3 प्रतिशत शर्करा शुगर 11015 प्रतिशत प्रोटीन और 4.5% खनिज लवण होते हैं इसमें विटामिन सी भी पर्याप्त मात्रा में पाए जाते हैं लीची का फल सेवन करने से हृदय तथा मस्तिष्क को बल मिलता है। 

यह प्यास को भी शांत करता है अतः एक ही साथ इसे अधिक नहीं खाना चाहिए लीची के फल ताजे खा जाते हैं, फल मई से जुलाई तक मिलते हैं। लेकिन स्थित भंडारों में रखे फल महीनों में खाने के लिए उपलब्ध हो सकते हैं। 

लीची का  उत्पत्ति स्थान

लीची गर्मियों का फल है लीची उगाने वाले देशों में भारत का विश्व में दूसरा स्थान है चीन देश को इसकी जन्मभूमि मानी जाती है। 

 हमारे देश में लीची के दो प्रमुख क्षेत्र हैं -

1. उत्तर सूखा फल प्रदेश -लीची का उत्पादन केवल पंजाब में गुरदासपुर जिले तथा उत्तर प्रदेश के सहारनपुर और उत्तराखंड के देहरादून जिले तक ही सीमित है देहरादून और सहारनपुर में लीची के सुंदर बगीचे हैं जो ग्रीष्म ऋतु में पेडों पर लीची लदे होते हैं। 

2. पूर्वी आर्द्र फल प्रदेश - इस क्षेत्र मुक्ता बिहार के चंपारण मुजफ्फरनगर दरभंगा और भागलपुर जिले में तथा उत्तर प्रदेश के गोरखपुर, आजमगढ़, फैजाबाद, इलाहाबाद और वाराणसी जिले में लिखी अधिक होती है। 

लीची की खेती के लिए जलवायु कैसी होनी चाहिए 

लीची के लिए मामूली नम और गर्म जलवायु की आवश्यकता होती है पहले और दूसरे लीची को हानि पहुंचती है लीची को ऐसे क्षेत्रों में आसानी से उगाया जा सकता है जहां गर्मियों में अधिक गर्मी ना पढ़ती हो और जाड़ों में अधिक सर्दी ना हो इसे 1000 मीटर की ऊंचाई तक आसानी से उगाया जा सकता है उत्तरी शुष्क प्रदेश के लीची उगाने वाले तराई क्षेत्रों की ऊंचाई 450 मीटर से लेकर 625 मीटर तक है। 

जहां मैदानों की अपेक्षा स्पष्ट रूप से शीत ऋतु अधिक भीषण होती है और बोली थी कि फलाने के समय में इस सारे क्षेत्रफल में तापमान कुछ अधिक रहता है ग्रीष्म ऋतु में वर्षा के आगमन से पहले तक यहां तूफानी आंधियां चलती हैं वर्षा वार्षिक 90 सेंटीमीटर से लेकर 125  सेंटीमीटर तक होती हैं सहारनपुर और देहरादून जिलों के मौसम को पर्वतों की निचली भूल पर गर्म समिति शीतोष्ण जलवायु का कुछ लाभ प्राप्त होता है। 


अतः यहां दोनों प्रदेशों में उगने वाले फल सरलतापूर्वक उगाए जा सकते हैं। आजकल प्रदेश के बिहार और यूपी उत्तर प्रदेश क्षेत्र में 75 सेंटीमीटर से अधिक वर्षा होती है। और जनवरी के महीने में ताप  21 डिग्री सेल्सियस रहता है मौसम फलों के मौसम में तापमान भी ऊंचा रहता है अतः स्पष्ट है कि लीची का फल उत्पादन के लिए गर्म जलवायु आवश्यक होता है फलों के पत्ते समय सूची हवा चलने से पलट जाते हैं देश में सबसे अधिक क्षेत्रफल बिहार में है। 

लीची की खेती के लिए भूमि की तैयारी कैसे करे 


लीची के लिए पर्याप्त गहराई की ऐसी भूमि की आवश्यकता होती है जिसमें पानी का निकास का समुचित प्रबंध हो लीची  के लिए मृतिका दोमट मिट्टी सर्वोत्तम रहती है। दोमट भूमि में भी लीची की अच्छी उपज होती है। 

दोमट भूमि में कैल्शियम की पर्याप्त मात्रा उपलब्ध होने पर लीची की उत्तम उपज होती है। 6 और 7 p. h बजे के बीच अम्लीय भूमि लीची की उपज उगाने की क्षमता रखती है अति उत्तम लीची की मिट्टी में कार्बनिक पदार्थ की मात्रा काफी होनी चाहिए।


 खाद और उर्वरक 

पेड़ की उम्र (वर्ष में )        गोबर की खाद                 नाइट्रोजन          फास्फोरस             पोटाश 
                              (किग्रा प्रति पेड़ )            (ग्रा० प्रति पेड़)    (ग्रा० प्रति पेड़)        (ग्रा० प्रति पेड़)

     1                                 15                                  60                 30                           30

     2                                 20                                  120               60                           60

     3                                 25                                  180               90                           90

     4                                30                                   240              120                         120

     5                                35                                   300              150                         150

     6                                40                                   360              180                         180

     7                                45                                   420              210                         210

     8                                50                                   480              240                         240

     9                                55                                   540              270                         270

    10                               60                                   600              300                         300

लीची का प्रवर्धन

लीची के पौधो को निम्नलिखित विधियों से तैयार किये जा सकते है
1 . बीज बोकर         
2. दाब कलम लगाकर 
3. भेंट कलम लगाकर 
4. मुकुलन द्वारा 

इन सब विधियों में गुटी अथवा दाब कलम  लगाकर पौधे तैयार करने में अधिक सहायता मिलती है।  

लीचीपौधे रोपने का समय और ढंग 

लीची के पौधे वर्षा ऋतु में खेत में बोए जाते हैं, लेकिन यदि सिंचाई की सुविधा हो तो फरवरी-मार्च में इन्हें खेत में बोया जा सकता है। लीची के पौधों को बोने के लिए अप्रैल-मई में खेत में 10 गुणा 10 मीटर की दूरी पर 1 मीटर व्यास के 1 मीटर गहरे गड्ढे गोद लेने चाहिए।और जून तक इन्हें खुला रखना चाहिए जिससे कि मिट्टी और गड्ढे धूप से अच्छी तरह तपे जाये। 

 एक वर्षा हो जाने पर जुलाई के प्रारंभ में इन गड्ढों में प्रत्येक 15 किलोग्राम गोबर की खाद 2 किलोग्राम चुना 250 ग्राम पोटाश 250 ग्राम एल्ड्रिन चूर्ण 10 किलोग्राम लीची के बाग की मिट्टी में मिलाकर गड्ढों को भर देना चाहिए। वर्षा ऋतु में मिट्टी अच्छी प्रकार से गड्ढों में बैठ जाएंगे अब अगस्त में इन गड्ढों के बीचो-बीच पौधा लगाकर उनके चारों तरफ हाला बना देना चाहिए। 


जिससे कि पानी तनु के संपर्क में ना आए पौधों को शीत ऋतु में पाले और ग्रीष्म ऋतु में लू से बचाना चाहिए इस उपाय से पौधों को स्विच देना चाहिए और पौधों के ऊपर और चटाई की पट्टियां लगा देनी चाहिए पूरब की ओर मुंह खुला छोड़ा जा सकता है। 

लीची की सिचाई 

छोटे पौधों को जाड़ों में पाले से बचाने के लिए सिंचाई कर देने की बात हम ऊपर कह चुके हैं सिंचाई कर देने से पौधों पर लोग का असर नहीं होता पौधों में फूल आने से पहले और उसके बाद फल लगने तक दो से तीन सिंचाई करनी चाहिए दिसंबर से मई तक लीची में सिंचाई करना बहुत आवश्यक है क्योंकि इसी समय लीची में फूल और फल लगते हैं और बढ़ते भी हैं। 

निराई और गुड़ाई

लीची के बाग की निराई गुड़ाई प्रत्येक सिंचाई के बाद की जानी चाहिए,खेत में घास बात कभी नहीं रहने देना चाहिए। 

काट -छाँट

पौधों को सुडौल बनाने के लिए प्रारंभ में कटाई छटाई की आवश्यकता होती है लेकिन पौधों के बड़ा हो जाने पर उन्हें कटाई छटाई करना संभव नहीं होता। फलों को गुच्छे में छोटी बड़ी टहनियां के साथ तोड़ लिया जाता है यही छटाई लीची के लिए पर्याप्त होती है। 

लीची की उपज

लीची के पौधों में प्रति पेड़ औसतन 1 से 2 क्विंटल फल लगते हैं अतः 10 गुणा 10 मीटर की दूरी पर लगाए गए लीची के बाग में प्रति हेक्टेयर तो पेड़ लगते हैं इनसे लगभग 100 से 200 क्विंटल फल प्राप्त होते हैं। 

लीची के फलों को सुरक्षित कैसे रखें 

शीत भंडारों में लीची के फलों को लगभग 3 से 4 सप्ताह तक सुरक्षित रखा जा सकता है। शीत भंडार का ताप 4.4 डिग्री सेल्सियस  से लेकर 6. 1०  सेंटीग्रेट होना चाहिए।

 किट नियंत्रण 

1. माइट -यह सफेद छोटा रंग का कीट होता है या पत्तियों के निचले भाग से रस चूसता है ऐसी पत्तियां सिकुड़कर गिर जाती हैं इनका प्रकोप मई से जुलाई तक अधिक होता है इसकी रोकथाम के लिए फेनकिल  
नामक दवा के 0.15 %प्रतिशत घोल का छिड़काव करना चाहिए। 

2. मिलीबाग-  यह  किट  यूं तो मुख्य रूप से आम को ही हानि पहुंचाता है लेकिन जहां आम और लीची के बाग साथ-साथ होते हैं वहां लीची के फूल तथा नए कलियों का रस चूसता  सकता है इसकी रोकथाम के लिए ओस्टीको  को पेस्ट की पट्टी  बांध देना चाहिए।


3. छिलका खाने वाली सूंडी -इस रोग का प्रकोप होने पर इसकी रोकथाम के लिए क्लोरोफॉर्म में डुबोकर छेदो में भर दे सुंडी  की रोकथाम के लिए इंडोसल्फान 35 एसी 2 मिलीलीटर प्रति लीटर  पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए।

रोग नियंत्रण

4. चूर्णी फफूँदी -इस रोग का प्रकोप होने पर फूलों और नई पत्तियों पर फफूँदी सफेद धूल जैसी दिखाई देती है इसके रोकथाम के लिए केराथेन   0.06% घोल छिड़काव करना चाहिए।

लीची के फलों को फटने से कैसे बचाएं 

फलों को फटने से बचाने के लिए निम्नलिखित उपाय करने चाहिए -

1. फलों पर मई के महीने में दो से तीन बार पानी का छिड़काव करना चाहिए।

2.  ऐसी किसमें लगाए जिनके फल कम पड़ते हैं।

3. नेफ़थलीन एसिटिक एसिड का 10 से 20 पी.पी.एम का घोल फलों पर छिड़काव करने से फल कम फटते हैं। 

सेब की खेती कैसे करें How to cultivate apple

सेब की खेती कैसे करें How to cultivate apple

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सेब की खेती कैसे करें How to cultivate apple

 सेब की उपयोगिता

सेब में पर्याप्त मात्रा में विटामिन बी और सी पाए जाते हैं ,खनिज लवणों में यह भी एक पल पर्याप्त रूप में धनी है सेब का सेवन हृदय मस्तिष्क जिगर और अमाशय को बल देता है गर्मी कोई भी यह दूर करता है।  सेब की चटनी मुरब्बा रैली साइडर इत्यादि पदार्थ बनाए जाते हैं जबकि कुछ जातियां साग-भाजी के रूप में भी प्रयोग की जाती हैं। 

सेब का उद्भव

सेब  की उत्पत्ति स्थानों के संबंध में विद्वानों में मतभेद है कुछ लोग यूरोप महाद्वीप तथा दक्षिण पश्चिमी एशिया के काला सागर के बीच स्थान को  सेब का मूल स्थान मांनते हैं हिमाचल प्रदेश में सेब को आदिकाल से उगाया जाता रहा है। सेब की प्रसिद्धि अम्बरी नामक जाति का मूल स्थान हिमालय और इस समय जाती कश्मीर के काफी बड़े क्षेत्रफल में उगाई जाती है। 

भूमि 

सेब के लिए मृतिका दोमट भूमि से अच्छी रहती है भूमि से पानी के निकास का उत्तम प्रबंध होना चाहिए कुछ कुछ अम्लीय भूमि सेब की खेती के लिए अनुकूल रहता है वह में पर्याप्त रूप से गहरा होना चाहिए हमारे देश के सेब उगाने वाले क्षेत्रों की भूमि मुख्य रूप से परती पड़ी हुई अवसादी शैलो अथवा  चट्टानों द्वारा निर्मित और मिट्टी से बनी है।

खाद और उर्वरक


 सेब के पेड़ों के लिए निम्नलिखित विधि से खाद उर्वरक डालना चाहिए।

पहले साल- पेड़ लगाने के बाद उसी वर्ष मार्च महीने में प्रत्येक पेड़ के ताले में 150 ग्राम के हिसाब से कैल्शियम अमोनियम नाइट्रेट मिलाना चाहिए।

दूसरे साल -प्रत्येक पेड़ के ताले में 10 किलोग्राम गोबर की खाद मिल आनी चाहिए इसके बाद हर साल 10 किग्रा के हिसाब से खाद की मात्रा बढ़ाते रहें इस तरह पांचवें साल 40 किलोग्राम गोबर की सड़ी हुई खाद डालनी पड़ेगी इसके बाद भी हर साल 40 किग्रा के हिसाब से ही गोबर की खाद डालते रहे अथवा लगाने के 3 साल तक प्रति पेड़ 10 किलोग्राम गोबर की खाद 1 किलोग्राम हड्डी का चूरा और 4 किलोग्राम राख मिलाकर प्रत्येक वर्ष शीत ऋतु में देनी चाहिए।

इसके बाद खाद की मात्रा बढ़ा देनी चाहिए अथवा पेड़ के ताले में पहले साल 30ग्राम नाइट्रोजन 25 ग्राम फास्फोरस और 50  ग्राम पोटाश डालना चाहिए। इसके बाद हर साल इसी हिसाब से उर्वरक की मात्रा बढ़ाते रहें इस तरह 10 साल प्रत्येक पेड़ में 300 ग्राम नाइट्रोजन 250 ग्राम फास्फोरस और 500 ग्राम पोस्ट डालना चाहिए खाद और उर्वरक का प्रयोग पतझड़ के बाद चाहे जब किया जा सकता है।

नाइट्रोजन और पोटाश की आवश्यक मात्रा को उपलब्ध कराने के लिए उन लोगों की कुछ मात्रा को खेत में एक सच लेकर उसे कुदाल अथवा फावड़े से अच्छी तरह ढूंढें मिला देनी चाहिए फास्फोरस का प्रयोग पेड़ों के चारों ओर 10 सेंटी मीटर की गहराई तक करनी चाहिए।

सेब के पौधों को कैसे तैयार करें


 सेब के पौधों को दो प्रकार से तैयार किया जाता है

1. चश्मा बांधकर  2. कलम लगाकर या फिर रोपड़

 सेब के बने पेड़ तैयार करने के लिए मूल पौधों के रूप में सेब की नामक किस्म की प्रयोग की जाती है चश्मा बांधने अथवा कलम लगाने के लिए लगभग 1 वर्ष की उम्र के पौधे प्रयोग किए जाते हैं और चश्मा अथवा कलम बसंत ऋतु से प्रारंभ में लगाई जाती हैं कलम लगाने के लिए लगाए गए

 पौधों को क्यारी में इस प्रकार लगाना चाहिए कि उनके बीच में 40 से लेकर 90 सेंटीमीटर तक दूरी रहे चश्मा बांधकर सेब के पेड़ उत्पन्न करना उत्तम  है।  सितंबर के महीने में चश्मा बांध कर किया  जाता है ग्राफ्टिंग विधि से सेब के पेड़ उत्पन्न करने के लिए टंग ग्राफ्टिंग विधि अधिक सफल सिद्ध हुई है टंग  ग्राफ्टिंग कुमायूं की पहाड़ियों में वसंत ऋतु में किया जाता है।

सेब के पौधे कैसे लगाने चाहिए

 सेब के पौधे जाड़ों के दिनों में दिसंबर-जनवरी में लगाए जाते हैं उन स्थानों पर जहां बर्फ अधिक पड़ता है बसंत ऋतु में भी पौधे लगाए जाते हैं सेव लगाने के लिए 90 सेंटीमीटर गहरे हुआ 90 सेंटीमीटर व्यास के गोलाकार गड्ढे खोदे जाने चाहिए इन गड्ढों की आपस की दूरी 6 से 7 मीटर रखनी चाहिए। गड्ढों को गोबर की खाद और मिट्टी से भर कर छोड़ देना चाहिए और उचित समय पर पौधे लगाकर सिंचाई कर देनी चाहिए पौधे लगाने के बाद उनके ख्यालों में बना देना चाहिए।

 पौधों को सीधा रखने के लिए उनको सीधी लकड़ी के सहारे बांध दें और थालो  में से समय-समय पर खरपतवार उखाड़ दे ताकि पौधों का अच्छा विकास हो सकेसेब सेब  की अधिक पैदावार लेने के लिए उनके थालो  को पत्तियों से ढकना आवश्यक है।

सिचाई 

पौधों को अपने प्रारंभिक काल में बसंत तथा ग्रीष्म ऋतु में सिंचाई की आवश्यकता होती है जिस क्षेत्र में हमारे देश में सेब के बाग हैं पर्याप्त वर्षा होने के कारण पौधों के एक बार लग जाने से फिर उन्हें सींचने  की आवश्यकता नहीं होती।

कटाई और छटाई 

1. फलदार पेड़ों की कटाई छटाई करते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए।

2. सिर के ऊपरी भाग से शुरू कर के भीतर की ओर कटाई करनी चाहिए।

3. कटाई करते समय सूखी रोटी और टूटी हुई शाखाओं को काट देना चाहिए।

4. पेड़ के जिस भाग में शाखाएं बहुत घनी हो उनमें से कुछ शाखाओं को काट देना चाहिए।

 5. मुख्य शाखाओं पर दूसरी और उन पर तीसरी शाखाएं निकलती हैं इनमें से जो शाखाएं ऊपर और नीचे की ओर सीधी बढ़ रही हो उनको काट देना चाहिए।

6. अधिक आयु की फल वाली फसल को काट देना चाहिए।

7. पेड़ों में हल्की छटाई करना अच्छा रहता है।

कटाई छटाई का काम सर्दियों में करना चाहिए क्योंकि उन दिनों पेड़ों में किसी तरह की बढ़वार नहीं होती है।

सेब के फूल को गिरने से कैसे रोके

सेब के पौधों में फरवरी-मार्च में फूल आता है कल के दिन सप्तशती जातियों के अनुसार अक्टूबर से अगस्त तक पकते हैं समय से पहले बालों को गिरने से रोकने के लिए निम्न उपायों को अपनाना चाहिए

 1.पेड़  के थालो में नमी की कमी नहीं होनी चाहिए।

 2.भूमि में और पेड़ों में सुहागा और मैग्नीशियम की कमी नहीं होनी चाहिए।

3.अल्फा मैथिली एसिटिक एसिड का छिड़काव 1.5 मिलीलीटर पानी की दर से करना चाहिए।

उपज 

सेब के प्रति पेड़ से लगभग 100 से 80 किलोग्राम फल मैदानों में 200 से 300 किलोग्राम तक पहाड़ों पर मिलते हैं एक हेक्टेयर में लगभग 250 पेड़ लगते हैं अतः प्रति हेक्टेयर लगभग 200 से 250 क्विंटल सेब मैदानों में 500 से 600 क्विंटल पहाड़ों पर प्राप्त होते हैं।

कद्दू, सीताफल या काशीफल की खेती कैसे करें-cultivate pumpkin,

कद्दू, सीताफल या काशीफल की खेती कैसे करें-How to cultivate pumpkin, betel leaf

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कद्दू की खेती, Kaddu ki kheti(pumpkin)


                                          

                             कद्दू या सीताफल या काशीफल
                                    ( Pumpkin)
               वानस्पतिक नाम  - Cucurbita moschata
                                     कुल - Cucurbitaceae     


संछिप्त परिचय -कद्दू का मूल स्थान अमेरिका है इसकी खेती का ढंग बिल्कुल लौकी के समान है अंतर केवल इतना है कि जहां लौकी की वर्षा की फसल को छप्परों इत्यादि पर चढ़ाया जाता है, कद्दू की बेल भूमि पर ही रेंगने दी जाती है लौकी और कद्दू की खेती पास-पास नहीं करनी चाहिए ऐसे लोगों का विश्वास है इस बात में केवल इतना ही पता है कि लौकी और कद्दू पर एक ही प्रकार के कीड़े मकोड़े लगते हैं, और एक फसल पर लगा कीड़ा दूसरी फसल को भी हानि पहुंचा सकता है अतः इन दोनों फसल को अलग अलग होगा ना ही सही होता है। 

भूमि 

कद्दू के लिए हल्की दोमट अथवा दोमट भूमि सर्वोत्तम रहती है भूमि से पानी निकास का समुचित प्रबंध होना चाहिए।भूमि कुछ-कुछ अम्लीय होने पर कद्दू की अच्छी उपज होती है। 

भूमि की तैयारी

कद्दू की अच्छी फसल लेने के लिए भूमि की एक बार किसी मिट्टी पलट हल से गहरी जुताई करनी चाहिए इसके बाद चार से पांच जुदाईयां देशी हल से करनी चाहिए प्रत्येक जुताई के बाद पटेला घुमाकर मिट्टी को समतल कर देना चाहिए। 

खाद तथा उर्वरक

काशीफल की अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए उसमें 300 से 400 कुंटल गोबर या कंपोस्ट खाद तथा 40 से 50 किग्रा नाइट्रोजन 40 से 50 किग्रा फास्फोरस 25 से 40 किग्रा पास कर देना चाहिए। गोबर की खाद से 1 माह पहले खेत की तैयारी के समय मिट्टी में मिला दे नाइट्रोजन की मात्रा फास्फोरस और पोटाश की मात्रा मिट्टी में मिला देंगे 45 दिन बाद टॉप ड्रेसिंग के रूप में जड़ों के पास देना चाहिए। 

बीज बोने का समय 

(अ)मैदानी मैदानी क्षेत्रों में

 1. ग्रीष्मकाल (जायद) 
नवंबर-मार्च। शीघ्र फसल के लिए इसे नवंबर में आलू की मेड़ों पर भी बोल देते हैं नदियां के कगार पर दिसंबर में बुवाई करते हैं इस फसल की पॉलिसी सुरक्षा करते हैं उन स्थानों में जायद की फसल फरवरी-मार्च में होते हैं। 

2.बरसात की फसल(खरीफ)-जून-जुलाई
(ब)पर्वतीय क्षेत्रों में-मार्च-अप्रैल 

बीज की मात्रा

कद्दू की जायद फसल लेने के लिए 6 से 7बीज प्रति हेक्टेयर आवश्यक होता है जुलाई में बोने जाने वाली फसल के लिए 4 से 5 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर प्राप्त होता है। 

बीज बोने का ढंग 

लौकी  की भांति काशीफल को भी गड्ढों (थालों) में और नालियों में बोते हैं काशीफल को 2.5 - 3 मीटर x 75 - 100 सेमी (पंक्ति xपौधे) की दूरी पर होते हैं। 
ग्रीष्म फसल -   2. 5 x.75 मि० 
वर्षा फसल -      3 x1.0  

उपरोक्त दूरी पर ताला बनाकर एक स्थान पर 3 - 4बीज 2.5 - 3 सेमी गहराई पर बोना चाहिए। 
बाद में एक स्वस्थ पौधा ही बढ़ने के लिए छोड़ते हैं नालियों में बोने पर नालियां निर्धारित दूरी पर 50 सेंटीमीटर चौड़ी 25 से 30 सेंटी मीटर गहरी बनाई जाती है जिसमें खाद डालकर 75 सेंटीमीटर की दूरी पर बीज को बो दिया जाता है। 

सिंचाई 

जायद फसल में प्रति सप्ताह सिंचाई की आवश्यकता होती है पानी पहले नालियों में दिया जाता है और खेत की बेल फैल जाने पर बेल भरने की सारी जगह में पानी फैलाया  जाता है। खरीफ की फसल में सिंचाई वर्षा ना होने पर आवश्यक होती है सामान्य वर्षा होने पर प्रायः सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती वर्षा का फालतू पानी खेत से बाहर निकालते रहना चाहिए। 

निकाई- गुड़ाई 

जायद की फसल में दो से तीन बार निराई करने की आवश्यकता होती है। जब तक बेल फैल कर भूमि में भली-भांति धक नहीं लेती निकाई गुड़ाई की जाती रहती है। खरीफ ऋतु में बोई जाने वाली फसल में खरपतवार अधिक जोर पकड़ते हैं।  अतः उन नियंत्रण रखने के लिए तीन से चार बार निकाय -गुड़ाई की आवश्यकता पड़ती है कद्दू की लताएं जमीन पर ही फैलाई जाती हैं अतः फल  भूमि पर ही लगते हैं। 

फसल की उपज 

काशीफल की औसत उपज 250 से 300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है। ग्रीष्म कालीन फसल की उपज 400 क्विंटल तक हो जाती है।  क्योंकि ग्रीष्मकालीन फल 20 से 25 किलो तक का हो जाता है लोगों के साथ काशीफल के 20 नवंबर में बो दिए जाते हैं। वर्षाकालीन फसल में कम पर मिलती है क्योंकि बेल को ऊपर नहीं चढ़ाया जा सकता।

कद्दू के  किट तथा रोग 

कद्दू का लाल किट 

यह किट लाल चमकदार और लंबे आकार का होता है या फलों में छेद कर देता है इसके बच्चे फसल की जड़ों में छेद करके खाते हैं।  

 इनकी रोकथाम के लिए सेविन धूल का 10 से 15 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें साइपरर्मेथ्रिन का 0.15% का छिड़काव बहुत ही कारगर सिद्ध हुआ है। 

कद्दू का मक्खी 

इस किट  की मादा कद्दू के फल के छिलके के अंदर अंडे देती हैं, इससे छोटे-छोटे कीट पैदा होकर अंदर ही अंदर फलों को खाते हैं वह सड़ा  देते हैं इनकी रोकथाम के लिए सेविन धूल का 0.2 प्रतिशत घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए। 

पाउडर की तरह फफूंदी

इस रोग के कारण पत्तियों की ऊपरी सतह तथा तनाव पर सफेद पाउडर जैसा पदार्थ जम जाता है जिसके फलस्वरूप समय से पहले ही पत्तियां गिर जाती हैं। 
इसकी रोकथाम के लिए फसल पर 0.0 6% कैराथेन ( 60 ग्राम दवा100 लीटर पानी )के घोल का छिड़काव करें। सुटोक्स 2 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर  से  घोल बनाकर फसल पर छिड़काव करने से अत्यधिक लाभ मिलता है। 

 कद्दू का बीज उत्पादन कैसे करे 

लौकी, काशीफल,तोरई, करेला, खरबूजा का बीज उत्पादन- कद्दू वर्ग की फसलों का बीज पैदा करने के उद्देश्य से हम कुछ स्वस्थ व चुने हुए रोगमुक्त फलों को बेल पर पकने के लिए छोड़ देते हैं जब फल पूर्ण रूप से पक कर तैयार हो जाए तो फलों को तोड़कर कुछ दिनों के लिए रख दिया जाता है उसके बादलों को चीर कर बीज निकाल लिए जाते हैं बीज को पानी से धोकर दूध में अच्छी तरह सुखाकर शीशियों में बंद कर रख दिया जाता है। 


खरबूजा की उन्नतशील खेती कैसे करें How to cultivate melon

खरबूजा की उन्नतशील खेती कैसे करें How to cultivate melon




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                                           खरबूजा
                                         (MUSK melon)
                          वैज्ञानिक नाम- Cucumis melo.ver.Reticulatus
                                       
                                      कुल - Cucubitaceae 


खरबूजा एक स्वादिष्ट फल है, जिसका प्रयोग पराया फल के रूप में ही खाने के लिए किया जाता है,असल में या निर्धनों का फल है। लेकिन अमीर और गरीब सभी लोग इसे बड़े प्रेम से खाते हैं। अरे फल की तरकारी भी बनाकर खाई जाती है खरबूजा प्रकृति में गर्म और तरह स्फूर्तिदायक व तरावट देता है। 

 कब्ज मूर्त और पसीने की रुकावट में लाभदायक है दोनों समय के भोजन के मध्य का समय तरबूज खाने के लिए सर्वोत्तम रहता है।  खरबूजा पकने के समय इसको जितना भी अधिक गर्मी और लू मिलती है उतना ही इस में मिठास आती है खरबूजे के बीज निकल जाने पर जो गिरी प्राप्त होती है। वह अमीरों के रूप में प्रयोग आती है इसके बीज अत्यंत पौष्टिक कहे जाते हैं बीच में 40 से 45% तेल होता है। 

 जलवायु  

खरबूजे की अच्छी खेती के लिए उचित तापमान और सुखे  जलवायु की आवश्यकता होती है विशेषकर फसल के पकने की अवस्था में अधिक तापमान खुली धुप तथा गर्म हवा  और सुस्क हवा मिलने पर फलों की मिठास में वृद्धि होती है वातावरण में अधिक नमी होने पर फसल में रोग लगने का भय रहता है और फलों का विकास उचित ढंग से नहीं हो पाता। 

भूमि और उसकी तैयारी

खरबूजा कई तरह की मिट्टी में उगाया जाता है लेकिन बलुई दोमट और कचहरी दोमट मिट्टी के उत्पादन के लिए उपयुक्त मानी जाती है भारी मटियार मैं इसको नहीं गाना चाहिए इसकी खेती के लिए भूमि का अनुकूलतम PH मान 6 से 6. 7  के बीच है। 

 नदी तट एवं राजस्थान के रेतीले इलाकों में खरबूजे की खेती विशेष रूप से की जाती है खेत तैयार करने के लिए एक बार मिट्टी पलटने वाला हल गहरी जुताई करके पांच से छह बार देशी हल से जुताई करनी चाहिए जिससे मिट्टी अच्छी तरह भुरभुरी हो जाए यदि खेत में नमी की कमी हो और अंतिम जुताई से पहले हल्की सिंचाई कर देनी चाहिए। 

खाद तथा उर्वरक

 खाद की आवश्यकता मिट्टी की किस्म और उर्वरा  शक्ति पर निर्भर करती है साधारण रेतीली भूमि में खाद अधिक मात्रा डालनी चाहिए मध्यम उर्वरता वाली बलुई दोमट में 250 क्विंटल गोबर की खाद 30 से 40 किलोग्राम नाइट्रोजन 25 से 30 किलोग्राम फास्फोरस और 20 से 30  पोटाश किलोग्राम प्रति हेक्टेयर प्रयोग करने से अच्छी उपज प्राप्त हो जाती है।

फास्फोरस और पोटाश की  पूरी मात्रा और नाइट्रोजन की आधी मात्रा  खेत की तैयारी के साथ ही डाली जाती है तथा नाइट्रोजन की बची हुई शेष मात्रा को फुल  आने के समय डालना चाहिए गोबर की अच्छी तरह चढ़ी हुई के लगभग 1 महीने पहले खेत में अच्छी तरह से मिला देना चाहिए।


बुवाई का समय 

बुवाई की विधि बीज के बोने के लिए 1.5 मीटर चौड़ी और सुविधाजनक लंबाई वाली क्यारियां बनाई जाती हैं जो क्यारियों के बीच 7 सेंटीमीटर चौड़ी नाली रखी जाती है क्यारियों में दोनों किनारों पर 90 सेंटीमीटर की दूरी पर बीज बोए जाते हैं प्रत्येक थैले में 4 से 6 बीच लगभग 1.5 सेंटी मीटर की गहराई पर होना चाहिए बीज की दर 3 से 4 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर

सिंचाई और निराई 

बीज बोकर पहली सिंचाई करने के पश्चात खरबूजे बढ़ने तक लगभग 1 सप्ताह के अंदर पर सिंचाई करते रहना चाहिए जब फलों का आकार आधे से कुछ अधिक बड़ा हो जाए तो 12  से 15दिन के अंतर पर सिंचाई करना पर्याप्त होता है। नालियों में यादों में अधिक पानी न भर जाए अन्यथा पौधों पर रोगों और कीटों का आक्रमण जल्दी होता है ,नदी तट पर आए के बाद दो बार पानी देना पर्याप्त होता है उसके बाद पौधों की जड़ें इतनी बढ़ जाती हैं रेत के नीचे कि पानी सतह पर पहुंच जाती हैं जिससे सिंचाई की आवश्यकता नहीं पड़ती है।

कीट एवं रोकथाम 

खीरा वर्ग की सभी सब्जियों में लगने वाले कीट खरबूजे में भी बहुत हानि पहुंचाते हैं सबसे अधिक हानि रेड पंपकिन बीटल ,फल मक्खी से होता है।

1. रेड पम्पकिन बीटल 

पहचान -यह लाल रंग का उड़ने वाला कीट है जो पौधों के उठते ही पत्तियों को खाना आरंभ कर देता है

रोकथाम - पौधों पर मेलाथियान 5% धूल का 30 से 35 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर छिड़काव करे।  या  0 . 15%सैपरमेथ्रीन के घोल में तीन केवल 150 मी 0 लीटर 100  लीटर पानी में छिड़काव करना चाहिए।

2. ईपीलेेकना बीटल 

पहचान -इसके ऊपर काले रंग के गोल धब्बे होते हैं इसके बच्चे और वयस्क दोनों ही पत्तियों को खाते हैं काटने वाली सुंडी रात में निकल कर छोटे पौधों को जड़ से काट देती है इसके रोकथाम के लिए उपयुक्त विधि बताए गए कीटनाशक दवाइयों का प्रयोग किया जा सकता है काटने वाली संडे को मारने के लिए पौधों के साथ-साथ जमीन पर कीटनाशक दवाओं को डालना चाहिए

3. फल मक्खी (फ्रूट फ्लाई )


पहचान -यह  खरबूजा की अत्यंत हानिकारक कीट है यह मक्खी कुछ पीले रंग की होती हैं तथा फलों पर अंडे देते हैं कभी-कभी 70 से 80% तक फल इससे ग्रसित हो जाते हैं निम्न विधियों से इनके आक्रमण को कम किया जा सकता है।


रोकथाम -ग्रसित फलो को एकत्रित करके जमीन में गहरा गाड़ दें।  खेत को तैयार करते समय एल्ड्रिन 5% धूल को जमीन की ऊपरी सतह पर बुरकाव करके  मिट्टी में मिला देना चाहिए।

बीमारी और रोकथाम 

1. चूर्णी फफूँदी 

यह फफूंद पत्तियों और तनो पर आक्रमण करती है पुरानी  पत्तियों के निचले भाग  में गोल सफ़ेद धब्बे प्रकट होते है ये धब्बे धीरे - धीरे बड़े होने लगते हैं। और इनकी संख्या में वृद्धि होती रहती है जिससे यह पत्तियों  के ऊपरी सतह पर छा जाते हैं।  

 इसका नियंत्रण करने के लिए लक्षण प्रकट होते ही रोग ग्रसित पौधों को उखाड़ दे। और पौधों पर घुलनशील गंधक जैसे सल्फेक्स  अथवा इलोसाल के 0.3 प्रतिशत घोल का छिड़काव करें 3 सप्ताह के अंदर पर तीन छिड़काव करें।

2. रोमिल  फफूँदी 

यह अधिक वर्षा और नमी वाले क्षेत्र में होती है पत्तियों के ऊपर सतह पर पीले रंग के धब्बे प्रकट होते हैं जो बाद में भूरे रंग के होने लगते हैं नवी अधिक होने पर पतियों की निचली सतह पर बैंगनी रंग के जीवाणु दिखाई देते हैं साधारणता प्रारंभ में धब्बे पत्तियों के मध्य में होते हैं। 

 जो धीरे-धीरे बाहर की तरफ की सतह पर फैलते हैं इसके नियंत्रण के लिए Rog ऋषि पौधों को निकाल देना चाहिए और पौधों पर इंडोफिल एम 45 की 2.5 किलोग्राम मात्रा 1000 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए। 

उपज 

उन्नत विधियों द्वारा करने पर  खरबूजे की उपज 150 से 200 कुंतल प्रति हेक्टेयर आसानी से प्राप्त होती है।